माहे रमज़ान एवं कोविड-19

 माहे रमज़ान एवं कोविड-19


* कुछ माहे रमज़ान के विषय में।

* कुछ कोविड-19  (कोरोनावायरस) महामारी के विषय में।


माहे रमज़ान:

    पवित्र माह रमज़ान की इस्लाम धर्म में बड़ी महत्ता है। इस महीने को "गुनाहों को जलाने वाला" महीना कहा जाता है। रमज़ान में मुसलमान पूरे माह रोज़ा रखते हैं। इस माह की "बरकत व रूहानियत" की प्राप्ति हेतु लोग गरीबों की आर्थिक सहायता ज़कात, फ़ितरा, सदक़ा आदि के रूप में दान देकर करते हैं। गरीबों की मदद करने के लिए कहा गया है।

 रमजान माह को दस-दस दिन के तीन भागों में बांटा गया है जिन्हें "अशरा" कहते हैं।

 प्रथम अशरा (10 दिन) "रहमत का अशरा"। 

द्वितीय अशरा (11 रमज़ान से 20 रमज़ान तक) "मगफिरत का अशरा"।

एवं शेष दिनों (तृतीय अशरा) को "जहन्नम से छुटकारा का अशरा" कहा जाता है।

 हर अशरा की अलग अलग महत्ताऐं, विषेशताऐं एवं खूबियाँ हैं जिसको ध्यान में रखते हुए मुसलमान इबादत करते हैं।

    अंतिम अशरा में मुसलमान मर्द मस्जिदों में तथा औरतें (महिलाएं) अपने घरों में "एतकाफ़" करते हैं अर्थात् एकाग्र मन से अल्लाह की इबादत करते हैं।

     चूँकि यह माह एक पवित्र माह है और इस माह में की गयी इबादत का सवाब (पुण्य) कई गुना बढ़ जाता है इसलिए मुसलमान रमज़ान में अपनी इबादत बढ़ा देते हैं।

    इस माह का महत्व इस लिए भी और ज्यादा है कि पवित्र धर्मग्रन्थ "क़ुरान" माह रमज़ान में ही उतारा गया जो कि सम्पूर्ण मानवता के लिए न केवल मार्गदर्शक है बल्कि सत्य व असत्य के बीच भेद करने का स्पष्ट प्रमाण भी देता है। इसके बारे में अल्लाह ने बहुत  विस्तार से कुरान में सोदाहरण समझाया है।

"अत: जो व्यक्ति इस माह को पाए वह रोज़ा रखे, और तुम में से जो व्यक्ति बीमार हो या यात्रा पर हो तो उसे दूसरे दिनों में गिनती पूरी करनी चाहिए"। ( अल-बकरा, 185 )

     उपरोक्त से रमजान माह के अहमियत का पता चलता है, अल्लाह ने इसे "फर्ज़" करार दिया है।

    इस माह का मुख्य उद्देश्य यह भी है कि सुबह से लेकर शाम तक पूरे दिन बिना कुछ खाए पिए भूखे प्यासे रहकर उन गरीब व भूखे परिवारों के वास्तविक स्थिति तथा उनके द्वारा सहे जा रहे कष्टों व दुखों का एहसास उन व्यक्तिओं को हो सके जिनका जीवन सुखमय है। और फिर वे गरीबों, असहायों की सहायता करने के लिए प्रेरित हों।  

     इस्लामी कलेंडर का नव्वाँ महीना रमज़ान का महीना होता है। हर मुसलमान को इस माह में इबादत बढ़ा देना चाहिए क्योंकि इस माह में एक फर्ज़ का सवाब सत्तर फर्ज़ के बराबर होता है I कुरान की तिलावत (पाठ) भी अधिक से अधिक करना चाहिए।

    माह रमज़ान की हम सब को कद्र करनी चाहिए। गीबत, चुगली व झूट से पूरी तरह बचने कि कोशिश करनी चाहिए, यूं तो ये ऐसी बुराईयाँ हैं जिनसे आजीवन दूर रहने की कोशिश करनी चाहिए। अपने एखलाक (आचरण) में सुधार लाते हुए सवाब के कामों में अपना समय अधिक व्यतीत करना चाहिए।

 कोरोनावायरस (कोविड-19) 

     हम मुसलमानों का यह ईमान है कि दुनिया में जो भी खैर व शर (अच्छाई व बुराई ) अल्लाह की तरफ से आती है वह हम मुसलमानों के अच्छे या बुरे आमाल का नतीजा है। इसलिए हम मुसलमानों को अब बहुत गहराई से सोचने व गौर करने का वक्त आ गया है कि हम से अल्लाह की कौन कौन सी ना फ़रमानियाँ हो रही हैं कि आज सारे दुनियां के न सिर्फ मुसलमान बल्कि अन्य लोग भी इस जानलेवा बीमारी के शिकार हो रहे हैं। इसलिए आज इस मौके पर आप सभी हजरात से सिर्फ यह अपील है कि:

    हम अपने तमाम छोटे बड़े गुनाहों से सच्ची तोबा करें। और रमज़ान के इस मुबारक महीने में अल्लाह से रो रो कर माफी मांगें और सारी दुनिया से इस बीमारी को खत्म होने की दुआएं करें ताकि सारे आलम के इंसानों को इस बीमारी से निजात मिल सके। हमारे पास इस कोरोनावायरस से लड़ने के लिए इस से बेहतर हथियार कोई नहीं है। 

   डाक्टरों की सलाह एवं हुकूमत के द्वारा दिए गए गाइडलाइन्स पर मुकम्मल अमल  करें। चाहे वह "दो गज दूरी" की बात हो या मस्जिदों में इबादत की बात हो। 

12, मई  2020

         अबुल हसनात क़ासमी 



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